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आज आप सभी के लिए पेश है सआदत हसन मंटो की पांच लघुकथाए

1 ) करामात
लूटा हुआ माल बरामद करने के लिए पुलिस ने छापे मारने शुरू किए।
लोग डर के मारे लूटा हुआ माल रात के अँधेरे में बाहर फेंकने लगे; कुछ ऐसे भी थे जिन्होंने अपना माल भी मौका पाकर अपने से अलहदा कर दिया, कानूनी गिरफ्त से बचे रहें।
एक आदमी को बहुत दिक्कत पेश आई। उनके पास शक्कर की दो बोरियाँ थीं जो उसने पंसारी की दुकान से लूटी थीं। एक तो वह जूँ-तूँ रात के अँधेरे में पास वाले कुएँ में फेंक आया, लेकिन जब दूसरी उसमें डालने लगा तो खुद भी साथ चला गया।
शोर सुनकर लोग इकट्ठे हो गए। कुएँ में रस्सियाँ डाली गईं। जवान नीचे उतरे और उस आदमी को बाहर निकाल लिया गया; लेकिन वह चंद घंटों के बाद मर गया।
दूसरे दिन जब लोगों ने इस्तेमाल के लिए कुएँ में से पानी निकाला तो वह मीठा था।
उसी रात उस आदमी की कब्र पर दीए जल रहे थे ।

2 ) गलती का सुधार

"कौन हो तुम?"
"तुम कौन हो?"
"हर-हर महादेव…हर-हर महादेव!"
"हर-हर महादेव!"
"सुबूत क्या है?"
"सुबूत…? मेरा नाम धरमचंद है।"
"यह कोई सुबूत नहीं।"
"चार वेदों में से कोई भी बात मुझसे पूछ लो।"
"हम वेदों को नहीं जानते…सुबूत दो।"
"क्या?"
"पायजामा ढीला करो।"
पायजामा ढीला हुआ तो एक शोर मच गया-"मार डालो…मार डालो…"
"ठहरो…ठहरो…मैं तुम्हारा भाई हूँ…भगवान की कसम, तुम्हारा भाई हूँ।"
"तो यह क्या सिलसिला है?"
"जिस इलाके से मैं आ रहा हूँ, वह हमारे दुश्मनों का है…इसलिए मजबूरन मुझे ऐसा करना पड़ा, सिर्फ अपनी जान बचाने के लिए…एक यही चीज गलत हो गई है, बाकी मैं बिल्कुल ठीक हूँ…"
"उड़ा दो गलती को…"
गलती उड़ा दी गई…धरमचंद भी साथ ही उड़ गया।

3 ) घाटे का सौदा

दो दोस्तों ने मिलकर दस-बीस लड़कियों में से एक लड़की चुनी और बयालीस रुपए देकर उसे खरीद लिया।
रात गुजारकर एक दोस्त ने उस लड़की से पूछा-"तुम्हारा क्या नाम है?"
लड़की ने अपना नाम बताया तो वह भिन्ना गया-"हमसे तो कहा गया था कि तुम दूसरे मजहब की हो…"
लड़की ने जवाब दिया-"उसने झूठ बोला था।"
यह सुनकर वह दौड़ा-दौड़ा अपने दोस्त के पास गया और कहने लगा-"उस हरामजादे ने हमारे साथ धोखा किया है…हमारे ही मजहब की लड़की थमा दी…चलो, वापस कर आएँ…।"

4 ) मिशटेक

छुरी पेट चाक करती (चीरती) हुई नाफ (नाभि) के नीचे तक चली गई।
इजारबंद (नाड़ा) कट गया।
छुरी मारने वाले के मुँह से पश्चात्ताप के साथ निकला-"च् च् च्…मिशटेक हो गया!"

5 ) रियायत

"मेरी आँखों के सामने मेरी बेटी को न मारो…"
"चलो, इसी की मान लो…कपड़े उतारकर हाँक दो एक तरफ…"

बटवारे  कि कहानिया, आजादी के समय कि कहानिया, मंटो कि कहानिया, मंटो, सआदत हसन मंटो

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