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यह कविता मैंने करीब चार साल पहले 2011 में लिखी थी । यह उनकी timeline से लिया गया है देवेन्द्र गेहलोद
कुछ दिनों से समाचार पत्रों में इंदौर में हुई घटनाओं को पढकर बड़ा अफ़सोस होता है जहा हर शहरवासी दूसरे पर आसानी से भरोसा कर सकता था हिंदू-मुस्लिम एकता की मिसाल दी जाती थी.... प्रस्तुत है दिल पर असर करती यह कविता...

हर तरफ है कत्लो-गारत,
दामनो पे दाग, और मुह पे रौनक
ये मेरे शहर को हुआ क्या है ?

ये सब देख के
अब और देखने को बचा क्या है ?
ये मेरे शहर को हुआ क्या है ?

लहू से रंगे हाथ है,
सियासत भी खामोश, अपने बांधे हाथ है
कोई बच्ची अब सहम सी जाती है
ये मौसम ये हवा क्या है ?

अब तो चारो और रावण ही रावण है
रक्षा किससे करोगे अपनी
निकले जो अकेले घर से तुम्हारे
बदमाश सारे तुम्हारी राह निहारे

अपनी अपनी रोटी सेके
नेता इन पर यूं नोट फेके
ये तो वही है जिन्हें चुना था
हां हमने अपने लिए काँटा बुना था

अब तो पत्थर भी रोने लगा है
इन हवाओ का असर सब पर होने लगा है
सब चुप बेठे अपने घरों में
डर लेके रखा है अपने सरो में

ये मेरा शहर था प्यारा
अपने आप में निराला-न्यारा
सीनों में आग तो फिर ये धुंआ क्या है
ये मेरे शहर को हुआ क्या है? - देवेन्द्र 'देव'
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