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बरसते हुए सावन में
आज वो पुराने दरख्त टूट गए
वो जिनकी तन्हाइयो की छाया में
कई राहगीरों की रहगुजर थी
वो जिनके बिखरे साये में
किसी के बचपन की कहानिया थी
पर बरसते हुए सावन में 
आज वो पुराने दरख़्त टूट गए
मैंने देखा था कितनी बार
तुफानो में संभालती हुई सी 
उनकी अहम कि कोमल काया को
तपिश में जल के पिघलते हुए
उनकी पत्तियों की आशाओ को
जो जाने कब से कितनी ऋतुओ को
मुस्कुराकर सताते थे
पर बरसते हुए सावन में
आज वो पुराने दरख्त टूट गए- बदनाम शायर "वरुण मित्तल"

Roman

Barastey hue saawan mei,
aaj woh purane darakth tut gaye,
woh jinki tahaniyo ki chaaya mei,
kai raahgiro ki rehguzar thi,
woh jinke bikhre saaye mei,
kisi k bachpan ki kahaniya thi,
par barastey hue saawan mei,
aaj woh purane darakth tut gaye,

maine dekha tha kitni baar,
tufaano mei samabhalti hui si,
unki ahm ki komal kaaya ko,
tapish mei jal k pighltey hue,
unki pattiyo ki aashao ko,
jo jane kab se kitni rituo ko,
muskurakar satatey they,
par barastey hue saawan mei,
aaj woh purane darakth tut gaye. - Badnaam shayar varun mittal

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  1. आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति आज शनिवासरीय चर्चा मंच पर ।।

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  2. ............. अनुपम भाव संयोजन

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