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पत्थरो की लकीरों सी है मेरे हाथ की लकीरे
उभर के मिट जाती है जज्बात की लकीरे
कभी हाथ की लकीरों में तो कभी तुझमे खोजते है हाथ की लकीरे
खुद मिट जाती है तो मिटा जाती है हालात की लकीरे
शहमात का खेल खेलती है जिन्दगी में लकीरे
फिर क्यों उभर आती है बिना बात की लकीरे

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