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तेरे इन सवालो का क्या जवाब दू !
अपने गुनाहों का क्या हिसाब दू !!

तुम जो रूठे मुझसे तो मेरा नसीब रूठ गया !
लोग पूछते है अब में क्या जवाब दू !!

ज़माने भर का गम अपने दिल में छिपा रखा है!
बस कोई पूछे तो गमो का एक सैलाब दू !!

एक खलिश है इस दिल में आज भी !
तुम बस एक और गम दो तो में इन्कलाब दू !!

बंद परवरदिगार से तुम्हारे लिए दुआ करेगा !
पर जाहिर तो करो, क्या तुम्हे जनाब दू !!

एक दिल है टुटा हुआ, और में हु बाकी !
तुम चाहो तो तुम्हे दुआए बेहिसाब दू !!

उनकी वजह से नींदे कही उड़ चली है हमारी " देव" !
मगर तुम कहो तो कुछ दिनों के वास्ते अपने ख्वाब उधार दू!! - देवेंद्र  देव 

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  1. ऐसी कवितायें रोज रोज पढने को नहीं मिलती...इतनी भावपूर्ण कवितायें लिखने के लिए आप को बधाई...शब्द शब्द दिल में उतर गयी.

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