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ऐ शहर तेरे बारे में सोचकर के हैरान हु में !
क्या करू इन दिनों बहुत परेशां हु में !!
की अब तू कुछ बदल सा गया है !
आज इन ऊँची इमारतो के बीच में एक छोटा सा मकान हु में !!
वो आज कही लुट गए तो कही क़त्ल किये जाते है !
की अब और देखा सुना नहीं जाता, आखिर इन्सान हु में !!

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  1. मैं आपका इस ब्लॉगिस्तान में तहे दिल से स्वागत करता हूं। अल्लाह आपके ब्लॉग से नेकी के संदेश को आम करे। आपको उन तमाम सलाहियतों से नवाज़े जो एक बेहतरीन लेखक के लिये ज़रूरी हैं।

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